एक और सफर

एक और सफर

आराम कर रहे थे जिस मंज़िल को आखिरी समझ, इक हल्के से झौंके ने जगा दिया!

धीमे से आकर बोला, अभी कैसे आंखें मूंदे हो, अभी कहाँ आराम से बैठे हो !

आया हूँ संग लेने तुमको, उठो , चलो, सामान उठाओ, अपने तो थोड़ा समेटो और संग मेरे चलो !

आंखों में भर आये आंसूं और दिल में समाया दर्द, पर होंठों पर लिए हलकी से मुस्कान, चल पड़े हम पकड़ फिर यकीन का दामन आज  !

राह में सोचते थे -अपने से दूर तो हैं पर दिखाई दे जाते हैं कभी, कर तो दिया है खुद को तुम्हारे हवाले पर वापिस आ जाते हैं अभी !

अब तो इंतज़ार है उस पल का होगे तुम इतना पास, मैं  ना रहूँगा मैं और तुम ना दिखोगे तुम!!!

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